थके हुए, घायल, लेकिन आखिरकार किसी की नज़र और देखभाल पाने वाले।
हमारी टीम चिंचली यात्रा मार्ग पर पशुओं की मदद के लिए हर कदम पर मौजूद रही।


बहुत से परिवार अपने खाने-पीने का सामान और बर्तन बैलगाड़ियों में लादते हैं, और फिर भारी भरकम जुए बैलगाड़ियों को खींचने वाले पशुओं की गर्दन पर रखकर उन्हें चिंचली मेले की ओर चलने के लिए मजबूर कर देते हैं। यह एक ऐसी यात्रा होती है जो उनके शरीर और मन दोनों को तोड़ देती है। बैल और टट्टू ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भारी गाड़ियां खींचते हुए मीलों चलते रहते हैं। कई बार उन्हें दौड़ाया भी जाता है। आगे चल रही गाड़ियों से उठने वाली धूल उनके नाक और गले को जला देती है। पूरे दिन बिना पानी के रहने से, अगर उन्हें खाना मिलता भी है, तो वह पेट में फंसकर दर्दनाक सूजन पैदा कर सकता है।
उन्हें नियंत्रित करने के लिए नाक में डाली गई रस्सियां उनके नायक के नथुनों को घायल कर देती हैं। भारी जुए गर्दन पर बड़े-बड़े छाले बना देते हैं, जो हर कदम के साथ और रगड़ खाते हैं। और अगर वे थककर रुक जाएं या सिर्फ सिर घुमा लें, तो चमड़े के कोड़े या नुकीले औज़ारों की दर्दनाक मार उन्हें फिर चलने पर मजबूर कर देती है। ऐसे अत्याचार किसी भी जीवित प्राणी के साथ नहीं होना चाहिए। लेकिन इस कठिन रास्ते पर उम्मीद भी मौजूद है, एनिमल राहत के निःशुल्क पशु-चिकित्सा और विश्राम शिविर। यहां थके हुए पशुओं को पानी, भोजन और आराम मिलता है, साथ ही चोटों और लंगड़ाहट का इलाज भी किया जाता है। इस वर्ष हमारी पशु-चिकित्सा टीमों ने 6,331 पशुओं को राहत पहुंचाई, 197 यातना देने वाले उपकरण ज़ब्त किए, और 3,666 पशुओं को इस कठिन यात्रा से पूरी तरह बचाया। श्रद्धालुओं के लिए बसों की व्यवस्था कर उन्हें पशु-मुक्त यात्रा का विकल्प दिया गया।