कछुए को यह पता नहीं था कि मछली पकड़ने का कांटा क्या होता है। लेकिन एक दिन, अचानक, एक नुकीला कांटा उसके मुंह की ऊपरी छत में धंस गया। वह न तो उसे निकाल सकता था और न ही ठीक से खा सकता था। उसके पास दर्द सहने और मदद का इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जब गलती से कछुए को कांटे में फंसा लेने वाले मछुआरे स्वयं उसे निकालने में असमर्थ रहे, तो एक दयालु व्यक्ति ने एनिमल राहत से संपर्क किया। सूचना मिलते ही बचाव दल मौके पर पहुंचा और भारतीय सॉफ्टशेल कछुए को तत्काल पशुचिकित्सीय उपचार दिलाने के लिए सुरक्षित रूप से अपने संरक्षण में ले लिया।

यह प्राचीन और संरक्षित प्रजाति अनजाने में ‘बायकैच’ (Bycatch) का शिकार बन गई थी। ‘बायकैच’ उन पशुओं को कहा जाता है जो मछली पकड़ने के जालों, डोरियों या कांटों में अनजाने में फंस जाते हैं अथवा घायल हो जाते हैं, जबकि वे मछुआरों का लक्षित शिकार नहीं होते। छोड़े गए या लापरवाही से फेंके गए मछली पकड़ने के उपकरण वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं, और एनिमल राहत की टीमों ने इनके कारण होने वाली पीड़ा और नुकसान को बार-बार करीब से देखा है।

एनिमल राहत की पशुचिकित्सा टीम ने अत्यंत सावधानी के साथ कछुए को बेहोशी की दवा दी और उसके मुंह में धंसे हुए कांटे को बड़ी सावधानी से निकाल दिया। पूरी प्रक्रिया के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि उसे कोई अतिरिक्त चोट न पहुंचे। इसके बाद पांच दिनों तक टीम ने उसकी गहन देखभाल की और उसके स्वास्थ्य लाभ पर लगातार नजर रखी। हर बीतते दिन के साथ कछुआ अधिक स्वस्थ, मजबूत और सक्रिय होता गया। अंततः यह जुझारू जीव एक नई जिंदगी की शुरुआत करने के लिए पूरी तरह तैयार था।
कृष्णा नदी के तट पर लेजकर उसे उसके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ा गया। आजादी मिलते ही कछुआ फुर्ती से पानी में उतर गया और देखते ही देखते तैरता हुआ दूर निकल गया।

इस विश्व महासागर दिवस पर याद रखें कि मछली पकड़ना केवल मछलियों को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि अनगिनत कछुओं, पक्षियों और अन्य “गैर-लक्षित” प्रजातियों को भी चोट पहुंचाता है। ऐसे और पशुओं की मदद करने में हमारा साथ दें: